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कर्नाटक का जीत : जाति और जमात



कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटों आज रिजल्ट घोषित होगा जिसमें   कांग्रेस, बीजेपी और जेडी (एस) तीनों ही सत्ता में आने के लिए अपने क्षमता और राजनीतिक समीकरण पर निर्भर हैं।  कर्नाटक में जातियों का ऐसा जाल है जिसमें परिणाम जो भी हो प्रतिशत का अंतर ज्यादा नहीं होगा।  जाति और जमात के बीच का चक्रव्यूह इतना आसान नहीं है क्यूंकि हाल में ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला जो एस - टी / एस सी एक्ट से संबंधित है और कर्नाटक सरकार द्वारा लिंगायत जाति को धर्म का दर्जा इसके अलावे अस्मिता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। इन सारे प्रश्नों के बीच प्रभावशाली जातियों का प्रदर्शन पर प्रश्न दलित समुदाय के द्वारा लगाया जा सकता है। इस संदर्भ में भाजपा के द्वारा आदिवासी समाज से उपमुख्यमंत्री का घोषणा काफी महत्वपूर्ण है। गुजरात जहाँ कोली, दलितों, आदिवासियों और उच्च जातियों के धुर्वीकरण से भाजपा सत्ता में आयी। केशव प्रसाद मौर्य को उपमुख्यमंत्री के समान यदुरप्पा को आगे करना एक नई रणनीति है जो सफल हो सकती है। कांग्रेस के जनाधार में तरह प्रतिशत मुस्लिम मतों एकतरफा धुर्वीकरण है और अन्य पिछड़ी जातियों के समर्थन से इंकार नहीं किया जा सकता है। प्रश्न यह है कि जे डी (एस) द्वारा पिछड़ों के वोट के विखराव से कांग्रेस का नुकसान तो भाजपा का फायदा होना निश्चित है।

आज कुछ ही घंटों बाद कर्नाटक का रिजल्ट आएगा। ऐसे में एक बार सोचा क्यों नहीं इस पर विश्लेषण किया जाए। दक्षिण भारतीय हों उत्तर भारत जाति और विकास के संगम से अब राजनीति नए रूप में चुकी है।  कर्नाटक में  जाति एक मुद्दा नहीं बल्कि जाति ही मुद्दा है।   यहां की राजनीति में पिछड़ा वर्ग समुदाय के रूप में प्रभुत्वशाली जाति है सत्ता का रास्ता बनाती है। इस सन्दर्भ में श्रीनिवास के अवधारणा से समाज को देखने की जरूरत है।  उन्होंने  भारतीय गाँवों में पायी जानेवाली जातिगत संरचना पिछड़े समुदाय के उभार को समझा था। जनसंख्या को  आधार बनाकर जिसमें धार्मिक अनुष्ठान को भी शामिल किया था उसके द्वारा प्रभुत्व जातियों का अवधारणा दिया था।[1] मगर इस अवधारणा में दलितों को शामिल नहीं किया गया था। शायद दलित उस समय राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं रहे होगें।
कर्नाटक के इस चुनाव में दलितों का उभार यह दिखलाता है कि समाजिक संरचना में दलित भी अब अपनी भागीदारी दिखा रहा है। बी  जी पी द्वारा  लिंगायत समुदाय के बीएस येदुरप्पा और एसटी नेता श्रीरामुलु को डिप्टी सीएम के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट बीजेपी कर्नाटक में जीत की राह को आसान बना सकती है।  श्रीरामुलु वाल्मीकि नयका समुदाय से आते हैं जिसकी आबादी लगभग 25 लाख के आसपास है और यह पूरे राज्य में फैली हुई है।[2] लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय के बीच केंद्रित जातिगत समीकरण को तोड़ने का प्रयास सफल होगा क्यूंकि दलितों और आदिवासियों के प्रति भाजपा एक नए समीकरण को बनाया जो समय का मांग था।  तत्कालीन  मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर भी यह आरोप है कि वे दलित विरोधी हैं। इस बात का फायदा भाजपा को मिल सकता है। समाजिक व्यवस्था  में परम्परागत आधार को निराधार बनाने में भाजपा का राजनीतिक प्रयोग काफी सफल प्रतीत भी हुआ है। ऐसे सिद्धारमैया भी  राज्य के तीसरे राजनीतिक ताकतवर  समुदाय कुरुबा जाति  से आते हैं।
दुर्भाग्य यह है कि अब राजनीति में रोजगार, आर्थिक कार्यक्रम, जन कल्याण के स्थान पर लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा या जातियों के जाल के दलदल में ही भारतीय प्रजातंत्र फँसती जा रही है। भविष्य में यह दिशा निश्चित रूप से दिशाहीन राजनीति को जन्म देगी। भूख के आग से जलता इंसान जाति रुपी पानी से शरीर को बचा पायेगा ? कब तक यह चलेगा ये तो पता नहीं लेकिन सत्ता किसी को मिलें लेकिन समस्या के प्रति संवेदनशीलता घटती ही जा रही है।
जातीय समीकरण और आर्थिक समीकरण के संघर्ष को नहीं समझ पाना भारतीय समाज के लिए खतरा है। सत्ता और समाज में हमेशा से ही किसी भी दल में आगे वही बढ़ेगा जिसके पास राजनीतिक विरासत - आर्थिक मजबूती और प्रेस तंत्र पर पकड़ हों वो जरूर बेहतर तरीके से अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा। प्रत्येक दल के कार्यकर्ता सिर्फ चुनावी बैनर लगाने से खुश होते हैं और बाद में उनके भूमिका को कोई नहीं नहीं पूछता है तो नाराज होकर पुरानी कहानियों के सहारे अपना जीवन चलाते हैं। बढ़ती जनसँख्या और परिवारवाद के अलावे ठेकेदार या दबंग से आम कार्यकर्त्ता को स्वप्न के सहारे ही काम चलना पड़ता है।
40 फीसदी  ओबीसी समुदाय 20 फीसदी दलित वोट यानि 60 प्रतिशत का आकंड़ा के नजर से  कांग्रेस और भाजपा का द्वन्द है। मगर 13 प्रतिशत पूरे गेम को घुमा भी सकता है। जातियों के अलावे क्षेत्रवाद भी कर्नाटक के राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा है। समाजशस्त्री विवेक कुमार ने स्पष्ट रूप से कहा है – “क्षेत्रीयता का अपना अलग समाजशास्त्र है, जिसे हम भाषा व संस्कृति से अलग नहीं कर सकते। भाषाई अस्मिता क्षेत्रवाद को जन्म देती है। इसका ज्वलंत उदाहरण 1956 में देखने को मिला था। राज्य पुनर्गठन आयोग की संस्तुति पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भाषाई आधार पर राज्यों का गठन किया। इसके अंतर्गत एक भाषा के आधार पर एक राज्य का गठन कर दिया गया, लेकिन इस व्यवस्था से भारतीय प्रजातंत्र मजबूत नहीं हुआ। आज एक ही राज्य में एक भाषा बोलने वालों का ही वर्चस्व हो गया है। होना यह चाहिए था कि कई भाषाओं को मिलाकर एक राज्य बनाया जाता, ताकि भाषा के आधार पर वर्चस्व को रोका जा सकता और मिश्रित भाषाओं के आधार पर प्रांत विकसित हो सकते। अगर इसे अब भी नहीं रोका गया तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) जैसे राजनीतिक दल क्षेत्रीयता के सहारे अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे। मनसे प्रमुख राज ठाकरे की क्षेत्रीयता की राजनीतिक सोच मौलिक नहीं है। उन्होंने यह सोच अपने चाचा बाला ठाकरे की शिवसेना से उधार ली है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कैसे 1960-1970 के दशक में शिवसेना आमची मुंबई का नारा देकर सत्ता के लिए दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीयों को निशाना बनाती थी। नब्बे के दशक तक उसने बंबई का नाम बदलकर मुंबई रख दिया। फिर क्या था मद्रास-चेन्नई हो गया, कलकत्ता-कोलकाता, बैंगलौर-बेंगलूर, पांडिचेरी-पुडूचेरी हो गए। सवाल यह उठता है कि क्या इस सबसे यहां पर रहने वालों के जीवन में गुणात्मक सुधार आया?”[3] कुमार का विश्लेषण कर्नाटक के चुनाव में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण दक्षिण भारतीय राजनीति में देखा जा सकता है। इस संदर्भ में कर्नाटक का चुनाव में त्रिशंकु होने का भी खतरा होगा। लेकिन हाल के चुनावों को देखकर ऐसा लगता है कि किसी भी दल को बहुमत जब भी आएगा तो पूर्ण बहुमत ही मिलेगा।



लिंगायत और वोक्कालिगा में अंतर
कर्नाटक सरकार ने फैसला लिया है कि वो लिंगायत समुदाय को एक अलग धर्म के रूप में दर्जा देने की सिफारिश केंद्र सरकार के पास भेजेगी।[4]राज्य की आबादी के   21   प्रतिशत लिंगायत, येदियुरप्पा के साथ ही रहते हैं या वो शेट्टर का साथ देते हैं. हालांकि येदियुरप्पा की पकड़ इस समुदाय पर आज भी मज़बूत है. जहाँ तक वोक्कालिगा का सवाल है तो इस समुदाय की आबादी 18 प्रतिशत है और जनता दल (सेकुलर) के एच डी देवेगौडा इसी समुदाय से आते हैं. दक्षिण कर्नाटक में इनकी आबादी ज्यादा है और जनता दल (सेकुलर) के एच डी कुमारस्वामी को उम्मीद है कि अपनी जाति के समर्थन के सहारे वो सत्ता के करीब पहुँच सकते है



दलित
23%
वोक्कालिगा
8.2%
लिंगायत
9.2%
मुस्लिम

13%
कुरुबा
8%

कर्नाटक की 6.5 करोड़ आबादी में लगभग 80 प्रतिशत अल्पसंख्यक, ओबीसी, अनुसूचित जाति और एसटी के अंतर्गत आतें हैं।[5] कुल मिलाकर यह तय है कि त्रिशंकु विधानसभा नहीं बनेगा। कांग्रेस और जे डी (एस) के विखराव का सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। दलितों और आदिवासियों को चुनाव में भाजपा द्वारा जोड़ा जाना एक नया संकेत है।




[1] Srinivas M.N. (1994) “The Dominant Caste and Other Essays”, Oxford India.

[2] http://www.india.com/hindi-news/india-hindi/bjp-to-project-b-sriramulu-as-deputy-cm-to-woo-dalits-in-karnataka/
[3] https://www.jagran.com/news/national-politics-of-region-and-caste-11178657.html
[4] https://www.amarujala.com/india-news/know-the-difference-between-lingayat-and-veershaiv-lingayat-karnataka-assembly-polls-2018
[5] https://hindi.newsclick.in/kayaa-karanaataka-vaidhaanasabhaa-caunaava-2018-maen-jaatai-eka-phaaikatara-haai

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