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दलितों के भीतर जातीय संरचना : आजादी के बाद बदलती सामाजिक संरचना


दलितों को कई लोगों ने अपने तरीके से परिभाषित किया है। समाजशास्त्री नंदू राम के अनुसार , हालांकि ' दलित ' शब्द लोगों की एक विशेष सामाजिक श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है, और अब यह सभी अछूतों द्वारा अपने सामाजिक पहचान के प्रतिनिधि के रूप में पारंपरिक और संकीर्ण  जाति के भेदभाव के बावजूद उपयोग किया जा रहा है। दलित शब्द का मतलब होता है। 'दबा-कुचला'[1] दलित शब्द का अर्थ है- जिसका दहन और दमन हुआ है, दबाया गया है, उत्पीड़ित, शोषित, सताया हुआ, गिराया हुआ, उपेक्षित, घृणित, रौंदा हुआ, मसला हुआ, कुचला हुआ, विनिष्ट, मर्दित, पस्त-हिम्मत, हतोत्साहित, वंचित आदि।  डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन दलित शब्द की व्याख्या करते हुए कहते हैं-दलित वह है जिसे भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति का दर्जा दिया है।[2] मेरे लेख में दलित का अर्थ अनुसूचित जाति से है जो समाज में पूर्व अछूत और हट्टन के अनुसार समाज के बाहर रहने वाली अस्पृश्य जातियां हैं। मैं यहाँ दलितों को परिभाषित करने के स्थान पर दलितों के मूलभूत समस्या पर ध्यान देना चाहता हूँ। दलितों के भीतर भी जाति के आधार पर समाजिक स्तरीकरण का उभरना एक नया समस्या है। आजादी के बाद दलितों के भीतर भी जातिगत भेदभाव के पीछे समान रूप से विकास नहीं होना और भारतीय परम्परा के प्रति विश्वास शामिल है। जो जाति ज्यादा घृणित कार्य करती है उसमें भी भेदभाव का भावना देखा जा रहा है। आंध्र प्रदेश में माला और मडिगा के भीतर  भेदभाव और समाजिक स्तरीकरण का बढ़ना एक नए प्रवृत्ति का सूचक है। माला जाति अपने को श्रेष्ठ और प्रभुत्वशाली समझती है क्यूँकि यह समुदाय मडिगा के तुलना में राजनीतिक और शैक्षिक रूप से ज्यादा जागरूक है। हाल में यह घटना इसलिए उभर रही है क्यूंकि आरक्षण के सिद्धांत से नव मध्य वर्ग का जन्म हुआ जो दलितों के भीतर जाति विशेष को ज्यादा लाभ मिला और कुछ जातियोँ विकास के पैमाने पर पिछड़ गयीं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी मायावती के उभार के बाद अन्य दलित जातियों में भी सापेक्षिक वंचना देखी जा सकती है। इसका परिणाम भी उत्तर प्रदेश के हाल में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनाव में देखा जा सकता है। उच्च जातियों के नजरों में दलितों को भलें ही एकसमान समझा जाता हों लेकिन दलितों के भीतर भी जातिगत चेतना और जागरूकता में कई प्रकार से विभेद हैं , इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है। सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं में सामाजिक स्तरीकरण के सिद्धांत में परिवर्तन आ रहा है। उच्च जातियों के भीतर भी जाति व्यवस्था है और इस समुदाय में भी कई आधारों में अन्तर ही नहीं बल्कि अन्तर्विवाही समुदाय है, जैसे  भूमिहार जाति का विवाह भूमिहार में होगा। अब जागरूकता और शिक्षा के स्तर में वृद्धि के बाद गोत्र के बाहर शादी करना आधुनिकीकरण के मूल्य का समावेश नहीं होना ही दिखलाता है। भारतीय समाज का  समाजशास्त्रीय निष्पक्षता से अध्ययन नहीं किया गया है क्यूंकि सोच में वैज्ञानिक मूल्य और तर्क का काफी अभाव है। हितों के समूह का निर्माण जरूर हो रहा है लेकिन समाजिक तथ्य इससे बिल्कुल अलग है। कुटिलता से विश्लेषण के स्थान पर वस्तुनिष्ठ विश्लेषण जरूरी है।



[1] http://ncert.nic.in/ncerts/l/hhss308.pdf
[2] http://www.pustak.org/books/bookdetails/2754

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