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तुम समझते नहीं

लोग कहने लगे

तुम समझते नहीं

सोचा

अब समझने लगे

लोग पराये होने लगे

सोचा

अपनों ने ही अपनों को घायल किया

वरना गुलामी को दावत नहीं देते

अब समझने लगे

लोग डराने लगे

सोचा

डरना छोड़ दिया होता

अगर

वर्षों पहले तो

पराया राज न किया होता

अपमान को सम्मान नहीं समझा होता

मुसीबत लाखों होते

मगर

कायरता न सीखी होती

मृत्युंजय कुमार 

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