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तुम साहब से भी बड़े बनते हो

इंसान तो इंसान ही होता है। इंसान जब समाज में रहता है तो उसे समाजिक नियमों का पालन करना पड़ता है। सभ्यता के विकास के साथ ही मनुष्यों ने भाषा का चयन किया। यहीं भाषा के कारण मनुष्य, पशुओं से श्रेष्ठ है। भाषा सिर्फ बोलने का माध्यम ही नहीं बल्कि संस्कृति का भी हिस्सा भी है।
बड़ा का पर्यायवाची छोटा होता है। बड़ा और छोटा भी तुलनात्मक रूप से सापेक्ष है। इसे समाजशाष्त्र के अनुसार दो संदर्भों में देखा जा सकता है।
1.     समाजिक विभेदीकरण
2.     समाजिक स्तरीकरण
एक ओर समाजिक विभेदीकरण का अर्थ यह है की दो मनुष्यों के बीच लम्बाई का अन्तर, रंग के आधार पर गोरा या काला, स्त्री और पुरुष में असमानता आदि। इसमें जीववैज्ञानिक के आधार पर अन्तर किया जा सकता है।
दूसरी ओर समाजिक स्तरीकरण मानव द्वारा निर्मित है। यह एक प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच आर्थिक, समाजिक, धार्मिक, राजनीतिक आधारों पर सापेक्ष रूप से विभिन्न वर्गों या समुदायों के बीच उच्च से निम्न श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। 

"तुम साहब से भी बड़े बनते हो" इस वाक्य को किसी ने बोला - मानों सामने वाला व्यक्ति मूर्ख और बुद्धिहीन हों। कुछ शब्दों का प्रयोग कुछ चालाक लोगों द्वारा आखिर क्यों किया जाता है। एक शब्द है उकसाना। बहुत चालाक लोग यह सोचते हैं की अगर किसी को उकसा देगें तो वह व्यक्ति स्वतः उस कार्य को छोड़ देगा। इसीलिए इस प्रकार के प्राणी अपने साथ ही रहते हैं और अपनी भाषा में मीठापन के त्वत्त को मिलाकर उकसाने का कार्य करते हैं। जब वो इस कार्य में सफल होते हैं तो सहसा उनके मुख से एक वाणी निकलती है - बहुत होशियार बनते थे। ऐसा सबक सिखाया जो जिंदगी भर याद रखेगा। शिक्षा जरूरी है सिर्फ नौकरी के लिए नहीं बल्कि ऐसे लोगों से हमेशा सतर्क होने के लिए भी।

तुम उम्र का ध्यान रखो।  हर चीज का ध्यान रख ही लिया मगर कोई उस कार्य को किया या नहीं ? सिर्फ ध्यान रखने के चक्कर में तो कार्य का ही चक्कर लगता है। ऐसा कोई भी क्यों नहीं समझ पाता है कि बर्बाद करना तो आसान है लेकिन किसी को भी बनाना मुश्किल है।
एक शब्द का ज्ञान भी जिसे नहीं हों वो आपको मूर्ख समझ सकता है। इसका एक उदाहरण भी देख सकते हैं।
अभिनंदन किसे कहते हैं ?
अभिनंदन अथवा अभिनन्दन शब्द किसी विशेष अवस्था में किसी के स्वागत के लिये प्रयुक्त होता है। अभिनंदन का तरिका सामाजिक रिति-रिवाजों से हटकर भी हो सकता है।[1] यह शब्द तब प्रयुक्त होता है जब किसी विशेष व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों के तुलना में श्रेष्ठ समझकर उस व्यक्ति को आमंत्रित किया जाता है।

ये देश का दुर्भाग्य है जब कोई व्यक्ति सिर्फ अच्छी - अच्छी बातों को बोलकर मूल उद्देश्य से ध्यान हटाता है। कुछ प्रश्न सिर्फ विचारणीय होते हैं।

शुप्रभात



[1] https://hi.wikipedia.org

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