जनतंत्र
के तीन आयाम दिखाई देते हैं - जनता, जमात और
जाति। तीन आयाम जो दिखाई नहीं देते हैं - धन,
ध्यान, धैर्य। जिस पुरुष में छह गुणों का समावेश होता है बाद में वहीं महापुरुष का
दर्जा पाते हैं। हर बार की तरह 2019 में भी लोकसभा चुनाव होगा। पुराने पाठ्यक्रम को
नया प्रिंट कर नए पाठ्यक्रम तैयार किये जायेगें। दलों में भी आने और जाने का इन्तजार होने लगेगा। हर चौक, चौराहे, गली, मोहल्ले में अपने
- अपने विचारों से लोग अवगत होने लगेगें। समीकरण बनेगा और टूटेगा। गठबंधन भी होगा और
टूटेगा भी, इतना ही नहीं आने वाले रुझानों के खबरों से एक दल दूसरे दल से वार्ता करना प्रारम्भ भी करेगा। जमात यानि
जनाधार के आधार पर अपना भविष्य देखा जायेगा। किस क्षेत्र में जातिगत समीकरण क्या है,
उसी के आधार पर टिकट भी तलाशा जायेगा। जिसके पास जनाधार नहीं होगा वो रणनीतिकार बनना
पसंद करेगा। ज्यादा प्रश्न पूछने पर यह कह देगा मेरे पास चुनाव लड़ने का समय नहीं है
क्यूँकि मेरा दल मेरे बिना जीत नहीं पायेगा। भारतीय अख़बारों में जातिगत और धर्म का
विश्लेषण छपने लगेगा। पत्रकारों का भी बाजार काफी गर्म हो जाता है। जनतंत्र का चौथा
स्तम्भ को राष्ट्र कि चिंता भी बढ़ जाएगी। एंकर भी जोर - जोर से चिल्लाने लगेगा।
आंचल
प्रवीण जो स्वतंत्र पत्रकार हैं उन्होंने लिखा
है - यहां विधायिका जहां कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका
कानूनों की व्याख्या करती है, उनका उल्लंघन करने वालों को सजा देती है, मीडिया जहां
समकालीन विषयों पर लोगों को जागरुक करने तथा उनकी राय बनाने में बड़ी भूमिका निभाती
है वहीं वह अधिकारों और शक्ति के दुरुपयोग को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा
करती है। मीडिया और टीआरपी के बीच के संबंधों से जिस प्रकार समाचार
को सनसनी बनाया जाता है वह कहाँ तक सही है।
आंचल जी ने आगे लिखा है - अच्छी दर पर पर्याप्त विज्ञापन जिस टीवी चैनल की अधिक
टीआरपी होती है अथवा जिन समाचार पत्रों-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या अधिक से अधिकतम
होती है उन्हें अच्छी दर पर पर्याप्त विज्ञापन प्राप्त होता है। परंतु मीडिया घरानों
के व्यवसायी प्रवृति के कई लालची मालिकों द्वारा केवल प्राप्त होने वाले विज्ञापनों
पर ही संतोष नहीं किया जाता बल्कि इनकी लालच इस कद्र बढ़ जाती है कि यह मीडिया के मौलिक
सिद्धांतों को त्यागने से भी नहीं हिचकिचाते हैं। मीडिया बना बिजनेस चुनावों के दौरान
अगर निष्पक्षता का ढोंग रचने वाले इस मीडिया ने किसी ऐसे राजनैतिक दल के पक्ष में अपने
घुटने टेके हैं जो बाद में सत्ता में आ गया हो फिर तो उस मीडिया घराने की दसों उंगलियाँ
घी में और सर कड़ाही में यानी एक तो अब उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता दूसरे उसे विज्ञापन
के रूप में धनवर्षा की भी कोई कमी नहीं रहती। पेडन्यूज का शिकार यहां यह कहना भी प्रासंगिक
है कि जो समाचार पत्र पेड न्यूज़ का शिकार नहीं हैं तथा पेड न्यूज़ जैसी भ्रष्ट व पक्षपातपूर्ण
व बिकाऊ व्यवस्था को अनैतिक मानते हुए इसका विरोध करते हैं उन्हें इन्हीं चुनावों के
दौरान ऐसे प्रत्याशियों तथा समाचार पत्रों को भी प्रमाण सहित बेनक़ाब करना चाहिए जो
पैसे देकर समाचार पत्रों में अपने झूठे कसीदे प्रकाशित करवाते हों।[1] जनतंत्र
के लिए दुर्भाग्य की बात है समाचार अब व्यापार बन गया है। समान बेचना पहली प्राथमिकता
है उसके बाद समाचार भी बेचा जाने लगा है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के बाद समाचारों
का बाजार भी काफी प्रगति किया है। जमात भी उसी समाचार को पढ़कर विश्लेषण करने लगता है।
बड़े दुःख की बात है चुनाव की प्रक्रिया में मीडिया को निष्पक्ष और स्वतंत्र होना चाहिए
लेकिन कई उदाहरणों से ये पता चलता है राजनीति और मीडिया को अलग नहीं किया जा सकता है।
अच्छे पत्रकार भी अगर अपना कुछ अच्छा लिखना चाहेगें तो उन्हें भी बेरोजगारी का ही सामना
करना पड़ेगा। हिमांशु शेखर ने अपने लेख में सही लिखा है कि - पश्चिमी देशों की पत्रकारिता
भी बदली लेकिन वहां जो बदलाव हुए उसमें बुनियादी स्तर पर भारत जैसा बदलाव नहीं आया।
इन बदलावों के बावजूद अभी भी हर देश की पत्रकारिता को एक तरह का नहीं कहा जा सकता है।
पर इस बात पर दुनिया भर में आम सहमति दिखती है कि दुनिया भर में पत्रकारिता के क्षेत्र
में गिरावट आई है। इस गिरावट को दूर करने के लिए हर जगह अपने-अपने यहां की जरूरत के
हिसाब से रास्ते सुझाए जा रहे हैं।[2] पत्रकारों
की हत्या और उनके साथ दुर्व्यवहार भी चिंता का विषय है। पूरा समुदाय कभी भी खराब नहीं
होता है। आज भी बहुत ऐसे पत्रकार हैं जो अपने जीवन की चिंता किये बगैर लिखते भी हैं
और बोलते भी हैं। मगर सरकार को भी इनके सुरक्षा के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
जनतंत्र
का एक ऐसा पहलू है जिसे जानना सबसे ज्यादा जरूरी है। इसी पहलू और आधार पर क्षेत्रीय
दलों की राजनीति भी चलती है। राष्ट्रीय दलों द्वारा भी इस समीकरण को नजरअंदाज कर पाना
असम्भव है। जनतंत्र और जाति के बीच पारस्परिक संबंध है। आज के राजनीति ही नहीं बल्कि
स्वतंत्रता पूर्व भी विशेष रूप से जातिगत आंदोलन से ही कई दलों का जन्म हुआ। मूल रूप
से मंडल कमीशन के बाद जाति एक संस्था के रूप में पहचान बनने लगी। जाति का स्वरूप राजनीति
में स्पष्ट रूप से दिखने लगा। लोकतंत्र में भी सहभागी लोकतंत्र का सवाल खड़ा हो गया।
जाति
और अस्मिता के प्रश्न तो बहुत पुराने थे, लेकिन नब्बे के दशक में यह उग्र रूप धारण
किया। समरस समाज के भावना का प्रतिरोध हुआ जो समानता और स्वतन्त्रता जैसे मुद्दे के
साथ खड़ा हुआ। एक ओर धार्मिक आस्था के प्रश्न पर राम मंदिर बढ़ा तो मंडल कमीशन भी उसी
के साथ भी आगे आया। वी पी सिंह जो उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री थे उन्होंने पिछड़े
वर्गों को समाजिक और शैक्षणिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत किया। काका साहेब कालेलकर
जो 1953 में बनी थी लेकिन जनता पार्टी की सरकार
जब 1977 में बनी तो बी पी मंडल आयोग बना था। सरकार के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में
ले जाया गया। इंद्रा साहनी और भारत सरकार के मुद्दे पर सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण पिछड़े
वर्गों को दिया गया। क्रीमी लेयर का सिद्धांत आया और पचास प्रतिशत भी कैप बन गया। मगर
इसी निर्णय ने जाति संस्था को पुनः परिभाषित किया और राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से यह संस्था मजबूत हो गयी। यह समय धर्म और
जाति के विकास को राजनीति में जगह देने लगी। अप्रत्यक्ष रूप से जो बात कही जा रही थी
वो अब खुले मंच से कही जाने लगी।
राजनीति
और जाति के गठबंधन से नेता और नेतृत्व सामने दिखाई पड़ने लगा। आखिर जाति में वे कौन
से गुण थे जो आज भी कायम है। इतना ही नहीं विकास को सामने रख भी दिया जाता है तो पीछे
से जातीय समीकरण ही देखा जाता है।
जाति
कब तक जाएगी ????????????
जाति
व्यवस्था भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। गैर हिन्दू सहित सभी भारतवासियों
की जन्म से एक जाति होती है जो कि उसके सामाजिक अंतःक्रियायों एवं व्यवहारों के लिए
एक पहचान का कार्य करती है। परंतु जाति का अर्थ हिन्दू तथा गैर हिंदू में समान नहीं
होता है। गैर हिंदुओं में जाति का कोई धार्मिक पहलू नहीं होता है यह केवल उसका एक सामाजिक
स्तर होता है जिसका वह भाग होता है, जबकि हिंदुओं के लिए जाति उसके कर्म का पुरुस्कार
या दंड होता है।[3]
अगला
अध्याय - जाति, जातिवाद और चुनाव
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