समय में शक्ति है और शक्ति हमेशा समय के साथ नहीं रहती है। समय और संदर्भ बदलते ही शक्ति भी बदल जाती है। समय, शक्ति और संदर्भ हमेशा से ही परिवर्तनशील रहा है। एक मुद्दा जो कभी अप्रासंगिक हों वो प्रासंगिक हो जाता है। समय धन है और समय शक्ति के आयाम को भी बदल देती है। शक्ति पाने के लिए समय का चक्र भी बदल दिया जाता है। विचारों के दुनिया में भी समय का बड़ा खेल है। परिभाषा बदली तो नौ ग्रह से आठ ग्रह हो गए। परिवर्तन प्रकति का शाश्वत नियम है। समय से साथ भी प्रकृति भी बदलती है। अब दुनिया में प्रदूषण से उठने वाली समस्याओं इतना महत्वपूर्ण हो गयी, जिससे जीवन ही संकट में आ गया। दिल्ली के मौसम में भी जिंदगी के दिल के साथ ही प्रदूषण ने जीना बेहाल कर दिया। गुजरात में विडंबना यह है कि 1985
में पटेलों ने ही अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिए जाने का ज़बरदस्त विरोध किया था।
साल 1985 का आरक्षण विरोधी आंदोलन हिंदु-मुसलमान दंगों में बदल दिया गया था और हिंदूओं
में क्षत्रिय और हरिजन दोनों थे। यह वह समय
था जब विश्व हिंदु परिषद और बजरंग दल ने अन्य पिछड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों के
लोगों को अपनी ओर लाना शुरू कर दिया था।[1]
जुलाई 2015 में शुरू, पाटीदार समुदाय के लोगों ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के दर्जे की मांग के लिए गुजरात राज्य भर में सार्वजनिक प्रदर्शनों को अंजाम दिया।[2]
मात्र पैंतीस वर्षों में ही समय ने सिद्धांतों और विचारों में आखिर क्यों परिवर्तन
ला दिया। समाजिक व्यवस्था या आर्थिक व्यवस्था के अलावे कहीं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा
जिम्मेदार तो नहीं है। खैर इसके पीछे कारण जो भी हों समय के अनुसार सिद्धांत तो जरूर
बदला, ये तथ्य है।
गुजरात राज्य स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत बड़ी भूमिका अदा किया। भारत के एकीकरण में सरदार बल्लभ भाई पटेल और दंगा पीड़ितों के साथ रहकर राष्ट्र सेवा को समर्पित करने वाले गाँधी इसी राज्य से थे। आजादी के जश्न को नहीं मनाया था - महात्मा गाँधी। लाखों विरोध के बाबजूद गाँधी के सपनों के भारत में आम आदमी और समान्य नागरिक को जगह मिला। पूना पैक्ट का विरोध भी भारत के एकीकरण के लिए ही था। जिंदगी के महत्व को कम किया और राष्ट्र के महत्व को सर्वोच्च स्थान दिया। हालाँकि इसके गुण और अवगुण दोनों ही हों सकते थे।
समय के साथ वहां यानि गुजरात में परिवर्तन भी हो रहा है। शक्ति के समीकरण भी बदलने लगें और नए समीकरण भी उभरने लगें। भाजपा के एक पूर्व
मंत्री कहते हैं, " पटेल मूल रूप से किसान और खेतिहर थे जिन्होंने बाद में छोटी
और मध्यम औद्यौगिक इकाइयां शुरू की, लेकिन
अब ऐसी हज़ारों इकाइयां बंद हो गई हैं, जिससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ी है। दूसरी ओर, सरकार छोटे उद्योगपतियों की क़ीमत पर
बड़े औद्योगिक घरानों को तरज़ीह दे रही है।"[3] बेरोजगारी
दूर करने का माध्यम आरक्षण है या रोजगार के अवसर को सृजित करना। मेरा उद्देश्य यह है
कि आरक्षण एक नीति के में सारे समस्याओं को क्या खत्म कर देगीं ? आरक्षण के भीतर भी
कई प्रकार कि सीमा है जैसे यह सिर्फ सार्वजनिक सेवाओं तक सीमित है। अगर आरक्षण सभी
समुदायों को समान रूप से दे दिया जाएँ तो भी बेरोजगारी तो बनी रहेगी। नब्बे के दशक
से उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण से आर्थिक समस्याओं का जन्म हुआ उसका हल नहीं खोजा
गया। भारतीय समाज में एक समस्या यह भी है जो चीजों का विरोध करना हों उन चीजों का मांग
सभी के द्वारा अगर हो जाएँ तो वे चीजें स्वतः समाप्त हों जायेगीं।
शक्ति और सत्ता के केंद्र में जाति हिंदी भाषी राज्यों में नब्बे के दशक से तूल पकड़ा जबकि दक्षिण भारत में आजादी के आंदोलन से ही द्रविड़ राजनीति प्रारम्भ हुईं। समय भी अपने करवट को बदला उसे लगा गुजरात शायद इसमें पिछड़ न जाएँ तो आज आरक्षण और जाति अपने मुखर स्वर के साथ अपनी आवाज को बुलंद कर रहा है। जाति और धर्म के बीच गुजरते वख्त के साथ अब गुजरात अपने लक्ष्य के ओर बढ़ चुका है।
मेरा मानना है समय के साये में बहुत मुद्दे शामिल हो चुके हैं। रणनीति भी समय के साथ गठबंधन कर चुका है। शक्ति समय के साथ और विपरीत दोनों के कुशलतापूर्वक ही निर्वहन करेगी। समय किसी का इंतजार नहीं करता है। शक्ति भी सत्ता के साथ चली जाएगी। एक साधारण आदमी फिर पांच सालों बाद इंतजार करेगा - मेरा भाग्य कब बदलेगा ?
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