Skip to main content

गुजरात चुनाव : जाति, जीएसटी और चुनाव सुधार

हाल के वर्षों में चुनाव पर चर्चा का आधार में भी परिवर्तन हो रहा है। विशेष रूप से छोटे राज्यों के चुनावों के साथ पक्षपात होता है क्यूंकि वहां के जनसंख्या से केंद्र के सत्ता पर असर नहीं पड़ता है। गुजरात राज्य में 282 विधानसभा सीटों के अलावे मात्र 26 लोकसभा सीटें हैं। विधान परिषद हर राज्य में होना चाहिए। जनतंत्र में भागीदारी लोकतंत्र के लिए विधान परिषद का बनना अनिवार्य कर देना चाहिए। गुजरात में  मात्र 11 सीटें ही राज्य सभा में हैं। राज्यसभा में जहां पहली बार अमित शाह आये हैं वहीं दूसरी ओर अमहद पटेल पांचवीं बार चुके हैं। कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए बलवंत सिंह राजपूत और अहमद पटेल के बीच कड़ी टक्कर के बाद अहमद पटेल के जीत से ही गुजरात राजनीति में नाटकीय मोड़ आया। राज्य सभा के चुनाव का मामला भी चुनाव आयोग पहुंचा। इसीलिए चुनाव सुधार भी समय का ही मांग है। गुजरात में शरद पवार की पार्टी एनसीपी से जीते हुए दो विधायक हैं, जो एक बागी हो चूका था, दूसरा दल के समर्पित था। पवार जी ने अहमद पटेल को समर्थन दिया था। राज्य सभा का चुनाव में आजकल खरीद - फरोख्त के कारण उच्च सदन का स्तर उच्च नहीं रह गया है।

चुनाव सुधार के मुद्दे पर प्रत्येक दल और प्रत्येक दल का प्रत्याशी आने समझ और ज्ञान से बातें तो आदर्शवादी ही करते हैं, लेकिन यथार्थ पर कोई सुधार राजनीतिक दलों में इच्छा शक्ति के अभाव के कारण सम्भव नहीं हो पाया। देश के आजादी के जश्न में भी साम्प्रदायिक दंगों से भारत कि धरती खूनों से लाल हो रहा था। गम और ख़ुशी का वतावरण के बीच ही भारत और पाकिस्तान का निर्माण हुआ है। इसीलिए चुनावी इतिहास में धर्म उस समय ही शामिल हो गया था जब देश आजाद हो रहा था। जब बहुसंख्यक राजनीति से दलगत राजनीति का रूख आया तो स्वाभाविक रूप से चुनाव में भी धर्म का आगमन हो गया। मेरा मानना है कोई भी दाल या पार्टी धर्म या जाति का इस्तेमाल नहीं करती है। समाज में रहने वाले लोगों के इच्छा में जाति और धर्म अंतर्निहित है तो उसका कोई दल, संस्था, व्यक्ति, संगठन उसे भवनात्मक रूप से जोड़कर उसे अपने हितों के अनुरूप बदल देता है। राजनीतिज्ञ और जनता दोनों का स्वार्थ और हित जुड़े हैं। आरक्षण ने जाति व्यवस्था को एक नया पहचान दिया और समाजिक दोषों को आर्थिक हितों के साथ - साथ राजनीतिक हितों के साथ जुड़ गया। ऐसे हालत में जाति व्यवस्था एक मजबूत संस्था बनती जा रही है। आरक्षण मुद्दा जो शोषण या अत्याचार से जुड़ा था मगर वो एक लाभकारी सिद्धांत के रूप में सामने आ रहा है। इसी कारण जाट, गुज्जर, मराठा, पाटीदार, कोपा आदि समूहों द्वारा आरक्षण का माँग और इस माँग से नए नेता का जन्म हो रहा है। दुर्भाग्य यह है जब किसी आंदोलन से उभरा नेता यह कह दें - अब आरक्षण मुद्दा नहीं है और किसी दल को हराना है, उसके बाद मेरे पास कोई शब्द नहीं है।
चुनाव सुधार में जिन मुद्दों को उठाया जाता है जैसे - धनबल, बाहुबल, जोर-जबर्दस्ती, जाति, चुनावी हिंसा,धर्म, संप्रदाय, सत्तारूढ़ दल के द्वारा अधिकारीयों का दुरूपयोग, चुनाव में नशा - मादक पदर्थों का वितरण, पेड न्यूज़, मीडिया द्वारा मनोबल को बढ़ाना और घटना आदि - आदि।  अब अपराधियों में ज्ञान और बुद्धि के प्रसार के बाद पहले स्वयं और बाद में स्वयं के पत्नी या सेवक को चुनाव लडवाना एक नए प्रवृति का विकास हो रहा है। नेताओं में भी खुद के फस जाने पर पहले पत्नी, बाद में पुत्र और फिर पुत्री को चुनावी मैदान में उतारा जाता है। मेरा मानना है ममलूक राजतंत्र या दास वाले राजतंत्र में पुत्र से भी अधिक महत्व दासों का ही था। इसीलिए अब समर्थकों के जगह परिवारों को तरज़ीह दिया जा रहा है। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। 
चुनाव सुधार के बारे में लिखते हुए अजीब लग रहा है, क्यूंकि सभी लोगों का मानना है - चुनाव में जाति, धर्म, हिंसा, धन, परिवारवाद, पेड़ न्यूज़, हेट स्पीच, अमर्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन सारे राजनीतिक दल या राजनीतिज्ञ इसका उल्टा ही करने के बाद बोलते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए। हकीकत और आदर्श के बीच अगर महाभारत हुआ तो, पता नहीं चलेगा कि क्या हुआ ? पांडवों और कौरवों के बीच मीडिया में भयानक बहस रात्रि के लगभग ग्यारह बजे तक ही होगा बाद में प्रत्येक हित समूह उच्च मानदंड का पालन करते हुए आपस में सहयोग और समझौता ही कर लेगें। भयानक कहानी तब होती होगी जब मूल्यों का कोई भी पक्ष शेष रहता होगा। मुझे ऐसा लगता है समस्या कोई भी बड़ी या छोटी नहीं है बल्कि दूरदृष्टि के बिना कुछ भी दिखाई नहीं देता हैं। हितों का गठबंधन कभी भी चुनाव सुधार में भी हितों को ही देखेगें। जनतंत्र में जब जनमत भावना पर ही मत दे दें तो आखिर कोई क्यों कार्य करें।

ऐसे कई नेताओं में इतनी खूबी होती है जो आशाओं के किरण को कभी भी समाप्त नहीं करते। ऐसे ही किरण आपको तारकुंडे समिति में भी दिखाई देगें। इस समिति का गठन  (1974-1975) में  स्वतंत्र संस्था 'सिटिजंस ऑफ़ डेमोक्रेसी' की ओर से जयप्रकाश नारायण ने चुनावी सुधार के लिए किया था। इस समिति की सबसे प्रमुख सिफ़ारिश यह थी कि एक ऐसा क़ानून होना चाहिए, जिसके तहत सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों द्वारा अपने खातों, आय के स्नोतों और खर्च के ब्यौरे का पूरा हिसाब दिया जाए। यदि खाते में गड़बड़ी आदि पाई जाए तो इसे दंडनीय अपराध माना जाए। भारत में चुनाव की व्यवस्था करना और उसकी कार्यविधि को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए संविधान के अनुसार एक 'चुनाव आयोग' की स्थापना की गई है। चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हो, इस बात का आयोग द्वारा विशेष ध्यान रखा जाता है। पीछे के कुछ वर्षों में चुनाव पद्धति में कुछ ऐसी विसंगतियाँ उत्पन्न होने लगी हैं, जिन्होंने जनता की चुनावों में आस्था को कम किया है। हिंसा, फर्जी मतदान, मतदान केंद्रों पर कब्जा, काले धन का प्रयोग आदि कुछ ऐसी ही विसंगतियाँ हैं, जिनकी प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती ही जा रही है। इस कारण आज चुनाव व्यवस्था के महत्त्व में कमी आई है और जनता द्वारा भी उसे शंका की दृष्टि से देखा जाता रहा है। इस कारण सरकार को चुनाव प्रणाली में सुधारों के प्रति सचेत होना पड़ा और समय-समय पर इसके लिए आयोगों और समितियों की स्थापना की गई है, जिनका मुख्य उद्देश्य चुनाव व्यवस्था में सुधार लाने के लिए विभिन्न सिफ़ारिशें प्रस्तुत करना था। इस श्रेणी में मुख्यत: ‘तारकुंडे समितिऔर 1990 में दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में गठित 'गोस्वामी समिति' रहीं, जिनके द्वारा चुनाव सुधार सम्बंधी अनेक महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें प्रस्तुत की गई थीं।
सुझाव
चुनाव व्यवस्था में सुधार करने के लिए इस समिति द्वारा जिन सुझावों को प्रस्तुत किया गया, उनमें से प्रमुख इस प्रकार थे-
1.      आय के स्रोतों का उल्लेख तथा आय-व्यय का पूरा हिसाब लिखना, समस्त राजनीतिक दलों के लिए अनिवार्य कर दिया जाए और निर्वाचन आयोग इसकी जाँच कराये।
2.      प्रत्येक उम्मीदवार को सरकार की ओर से छपे हुए मतदान कार्ड नि:शुल्क दिये जाएँ तथा प्रत्येक मतदाता के नाम का कार्ड बिना टिकट लगाये डाक से भेजने की छूट की जाए।
3.      निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की सूचियों की 12 प्रतियाँ प्रत्येक उम्मीदवार को सरकार की ओर से नि:शुल्क दी जाए।
4.      लोक सभा अथवा विधान सभा के विघटन और नये चुनावों की घोषणा के बाद से सरकार काम चलाऊ सरकार की तरह से काम करे। वह तो नयी नीतियों की घोषणा करे और ही उन्हें लागू करे। नयी परियोजनाएँ चालू करे और ही उनका वादा करे। नये ऋण अथवा भत्ते दे और वेतन वृद्धि की घोषणा करे तथा ऐसे सरकारी समारोह आयोजित करे, जिनमें मंत्री, राज्यमंत्री, उपमंत्री अथवा संसदीय सचिव भाग लें।
5.      चुनाव के दौरान मंत्रिमण्डल के सदस्य सरकारी खर्च पर यात्रा करें। सरकारी सवारी और विमान प्रयोग में लायें। उनके दौरों के समय सरकारी कर्मचारी तैनात किये जाएँ।
6.      जमानत की रकम लोक सभा के उम्मीदवारों के लिए 500 से बढ़ाकर 2000 रुपये और विधान सभाओं के उम्मीदवारों के लिए 200 से बढ़ाकर 1000 रुपये कर दी जाए।
7.      राज्यों में निर्वाचन आयोग स्थापित किये जाएँ। 'केंद्रीय निर्वाचन आयोग' में एक के बजाय तीन सदस्य हों तथा उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति केवल प्रधानमंत्री के परामर्श पर नहीं, अपितु तीन व्यक्तियों की एक समिति की सिफ़ारिशों पर करे। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा लोक सभा में विरोध पक्ष का नेता प्रतिनिधि हो।
8.      मताधिकार की आयु 21 वर्ष के स्थान पर 18 वर्ष कर दी जाए।
9.      आकाशवाणी के सम्बंध मेंचंदा समितिकी रिपोर्ट पर अमल किया जाए तथा आकाशवाणी को निगम का रूप दिया जाए।
10.  निर्वाचन आयोग की सहायता के लिए केंद्र और राज्यों में निर्वाचन परिषदें बनायी जाएँ, जो उसे सलाह दे। इन परिषदों में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि हों। इनके अतिरिक्त मतदाता परिषदें भी बनायी जाएँ, जो निर्वाचन के समय होने वाली बुराइयों पर निगाह रखे तथा निर्वाचकों की निष्पक्षता की जाँच करे। 

गोस्वामी समिति  का गठन भी अपने सुझावों को दिया लेकिन हश्र सभी को पता है।
गोस्वामी समिति का गठन वर्ष 1990 में किया गया था। इस समिति ने भारत में होने वाले चुनावों के सम्बन्ध में कई महत्त्वपूर्ण सुझाव तथा सिफ़ारिशें पेश कीं। समिति की सबसे प्रमुख सिफ़ारिश यह थी कि किसी भी व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों पर चुनाव लड़ने की अनुमति न दी जाए तथा निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत राशि बढ़ायी जानी चाहिए। ऐसे सभी उम्मीदवारों की जमानत राशि जब्त की जानी चाहिए, जो एक चौथाई नहीं पा सके हों।

समिति गठन का कारण
भारत में चुनाव की व्यवस्था करना और उसकी कार्यविधि को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए संविधान के अनुसार एक 'चुनाव आयोग' की स्थापना की गई है। चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हो, इस बात का आयोग द्वारा विशेष ध्यान रखा जाता है। पीछे के कुछ वर्षों में चुनाव पद्धति में कुछ ऐसी विसंगतियाँ उत्पन्न होने लगी हैं, जिन्होंने जनता की चुनावों में आस्था को कम किया है। हिंसा, फर्जी मतदान, मतदान केंद्रों पर कब्जा, काले धन का प्रयोग आदि कुछ ऐसी ही विसंगतियाँ हैं, जिनकी प्रवृत्ति निरंतर बढ़ती ही जा रही है। इस कारण आज चुनाव व्यवस्था के महत्त्व में कमी आई है और जनता द्वारा भी उसे शंका की दृष्टि से देखा जाता रहा है। इस कारण सरकार को चुनाव प्रणाली में सुधारों के प्रति सचेत होना पड़ा और समय-समय पर इसके लिए आयोगों और समितियों की स्थापना की गई, जिनका मुख्य उद्देश्य चुनाव व्यवस्था में सुधार लाने के लिए विभिन्न सिफ़ारिशें प्रस्तुत करना था। इस श्रेणी में मुख्यत: ‘तारकुंडे समिति और 1990 में दिनेश गोस्वामी की अध्यक्षता में गठित 'गोस्वामी समिति' रहीं, जिनके द्वारा चुनाव सुधार सम्बंधी अनेक महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें प्रस्तुत की गईं।

सुझाव
'गोस्वामी समिति' द्वारा जिन सुझावों को प्रस्तुत किया गया, उनका वर्णन निम्नलिखित है-

1.      मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को न केवल सरकार के अंतर्गत किसी नियुक्ति बल्कि राज्यपाल के पद सहित किसी अन्य पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
2.      किसी भी व्यक्ति को दो से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों पर चुनाव लड़ने की अनुमति न दी जाए।
3.      सभी चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन (ईवीएम) का प्रयोग किया जाए।
4.      मतदान केंद्रों पर कब्जा और मतदाताओं को प्रभावित करने और डराने को समाप्त करने के लिए विधायी उपाये करने चाहिए।
5.      मतदान के दिन मोटर गाड़ियाँ चलाना, आग्नेय शस्त्र लेकर चलना, शराब की बिक्री और वितरण चुनावी अपराध घोषित होना चाहिए।
6.      मतदाताओं को बहुउद्देश्यीय पहचान पत्र प्रदान किया जाए ताकि फर्जी मतदान पर अंकुश लगाया जा सके।
7.      चुनाव आयोग में सदस्यों की संख्या बढ़ायी जाए तथा उसे बहुसदस्यीय बनाया जाए।
8.      सभी चुनावी मुद्दों की जाँच के लिए संसद की एक स्थायी समिति का गठन किया जाए।
9.      निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत राशि बढ़ायी जानी चाहिए। ऐसे सभी उम्मीदवारों की जमानत राशि जब्त की जानी चाहिए, जो एक चौथाई नहीं पा सके हों।
10. मतदाता सूची तैयार करने, अद्यतन करने आदि सम्बंधी सरकारी ड्यूटी का उल्लघंन करने पर दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए।
11. आयोग के पर्यवेक्षकों को क़ानूनी हैसियत प्रदान की जाए और उन्हें कुछ हालातों में मतगणना रोकने का अधिकार दिया जाए।
हालांकि 'गोस्वामी समिति' में महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया था, लेकिन इस समिति द्वारा प्रस्तुत की गई सिफ़ारिशों को क्रियान्वित नहीं किया गया। आगे चलकर चुनाव सुधारों से सम्बंधित जिन आयोगों और समितियों का गठन किया गया, उनके लिए इसकी सिफ़ारिशें महत्त्वपूर्ण प्रेरणादायक रहीं और समय-समय पर सरकार द्वारा इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशों को स्वीकार भी किया गया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य 'निर्वाचन आयुक्त अधिनियम 1991' तथा लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम 1996 के द्वारा समिति की अनेक सिफ़ारिशें लागू हो गईं।[1]


प्रसिद्ध संविधानविद् सुभाष कश्यप ने कहा कि 15वीं लोकसभा के लिए विभिन्न राजनीतिक पार्टियाँ जिस प्रकार की राजनीति कर रही हैं वह किसी भी सूरत में लोकतंत्र के लिए लाभप्रद नहीं है। समय-समय पर चुनाव सुधार की सिफारिश की जाती रही है लेकिन इन्हें लागू करने में कोताही बरती जाती रही है।
अगस्त 1997 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त जीवीजी कृष्णमूर्ति ने राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए कानून बनाने और प्रशासनिक उपाय करने का प्रस्ताव किया था। जुलाई 1998 में निर्वाचन आयोग ने सिफारिश की थी कि जिन व्यक्तियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल हो जाए उन्हें विधानमंडलों या संसद का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाना चाहिए।
पाँच जुलाई 2004 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने सरकार को लिखा था कि 14 लोकसभा के चुनावों के दौरान चुनाव कानून में अनेक कमियाँ नजर आई हैं। कुछ उम्मीदवारों ने सूचना देते समय कुछ कॉलमों को खाली छोड़ दिया है और कुछ ने अपनी संपत्ति कम दर्शाई है। मौजूदा कानून के अनुसार इन अपराधों के लिए छह महीने की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान है। आयोग ने इसे बढ़ाकर दो वर्ष और जुर्माना राशि में वृद्धि जमानत राशि में वृद्धि एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर रोक एक्जिट पोल और ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी लेकिन ओपिनियन पोल पर सहमति नहीं बन सकी थी। राजनीति के अपराधीकरण पर हाल ही में सेवानिवृत्त होने वाले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने स्वीकार किया कि चुनाव लड़ रहे किसी भी व्यक्ति के खिलाफ राजनीति से प्रेरित मामले दर्ज किए जा सकते हैं इसीलिए चुनाव से छह माह पूर्व दर्ज किए गए मामलों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज कानून कहता है कि दोषी ठहराया जा चुका व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। ऐसी भी आशंका होती है कि झूठे मामले दर्ज किए जा सकते हैं और सत्तारूढ़ सरकार विपक्ष को निशाना बना सकती है। मेरी राय है कि अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कोई रास्ता निकाला जाना चाहिए। गोपालस्वामी ने धन के बेजा इस्तेमाल के बारे में कहा मैं यह नही कह रहा हूँ कि अमीर व्यक्ति को चुनाव नहीं लड़ना चाहिए लेकिन जो धनराशि खर्च की जा रही है वह बहुत है। गोपालस्वामी ने कहा कि पूर्व में इस बारे में आयोग ने एक प्रस्ताव तैयार किया था जिसे विधि मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति के पास भेजा गया था। लगभग 25 वर्ष पहले जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 77 की उपधारा एक में स्पष्टीकरण जोड़ा गया। इसके तहत उम्मीदवार के अलावा राजनीतिक पार्टी मित्र और समर्थक किसी अन्य व्यक्ति द्वारा खर्च किया गया धन उम्मीदवार के खर्चे में शामिल नहीं किया जाएगा। इस स्पष्टीकरण के तहत किसी उम्मीदवार के चुनाव में उसकी पार्टी या समर्थकों द्वारा बेहिसाब धन खर्च किया जा सकता है। इस स्पष्टीकरण की आलोचना की जाती रही है, लेकिन निहित स्वार्थों के चलते इसे हटाया नहीं जा सका है। चिंतक और पत्रकार  सुरेन्द्र मोहन का कहना है कि चुनाव आयुक्त पद पर रहते हुए टीएन शेषन और एमएस गिल ने चुनाव सुधारों की कोशिश की लेकिन बाद के चुनाव आयुक्त में इसका अभाव दिखा। उन्हें भी पद पर रहते हुए प्रयास करना चाहिए था। शेषन के सपने भी भारतीय राजनीति में शेष ही रह गए। राजनीतिक दलों में चुनावी भ्रष्टाचार की बुराई को चुनाव सुधार के जरिये दूर किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ के लिए लोकतंत्र सुरक्षित हो सके। एक ऐसी व्यवस्था का प्रावधान हो जिसमें आपराधिक तत्वों को दूर रखा जा सके और ईमानदार लोगों को चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। भ्रष्टाचार के विभिन्न स्वरूपों को भी अलग से परिभासित करने की आवश्यकता है। बीते सालों के दौरान इंद्रजीत गुप्ता समिति, दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट और संविधान समीक्षा समिति ने महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव सुधार के संबंध में एमएन वेंकटचलैया और निर्वाचन आयोग के नेतृत्व वाली संविधान समीक्षा समिति को अनेक सुझाव दिए गए हैं। इन सिफारिशों पर जितनी जल्दी कार्रवाई करें उतना ही भारतीय लोकतंत्र के हित में होगा।[2] गुजरात में लोकसभा के चुनाव में विभिन्न दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में 73 करोड़पति प्रत्याशी मैदान में थे, जिनमें से राज्य के 26 सीटों पर भाजपा के 21 करोड़पतियों को जीत मिली है।[3] ये इस बात का प्रमाण है राजनीति में बिना पूंजी के कार्यकर्ता तो बन सकता है लेकिन नेता नहीं।
चुनाव सुधार इसलिए जरूरी है कि देश में गुड ऐंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू होने के बाद गुजरात में यह एक बेहद अहम चुनावी मसला बन गया है। चुनावों की घोषणा से ठीक पहले गुजरात के सीएम विजय रुपाणी ने माइक्रो सिंचाई उपकरणों पर से जीएसटी हटाने की घोषणा कर दी। यह भी एक प्रकार से चुनावी परिणाम को प्रभावित करेगा वैसे ही जैसे जाति या धर्म।   गुजरात को कारोबारी समुदाय  और व्यापार के लिए जाना जाता है। इसी कारण से प्रदेश का जनता विशेष रूप से कारोबारी समुदाय जीएसटी की वजह से उपजी आर्थिक मंदी से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नोटबंदी से देश अभी उबरा भी नहीं था कि जीएसटी से व्यापार और वाणिज्य को काफी गहरा धक्का लगा। 7 अक्टूबर को जीएसटी काउंसिल ने 27 वस्तुओं पर टैक्स रेट्स घटाए थे। इनमें से कई गुजराती कारोबार से जुड़े हुए हैं। गुजरात में टेक्स्टाइल कारोबारियों के असंतोष को देखते हुए सभी तरह के सिन्थेटिक फिलामेंट यार्न जैसे नायलोन, पॉलिस्टर आदि , मैनमेड स्टैपल फाइबर से बना सिलाई धागा और धागे आदि पर टैक्स में राहत दे दी थी। इसके अलावा गुजरात केंद्रित खाद्य सामग्री खाकरा और अन्य अनब्रैंडेड नमकीनों को भी 5 फीसदी टैक्स स्लैब के दायरे में लाया गया था।[4]

समाजशास्त्रीय विश्लेषण अगर गुजरात चुनाव का किया जाएँ तो इस बार के चुनाव में हाशिये पर जो समाज खड़ा है या वंचित वर्गों के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। एक ओर जी एस टी के कारण छोटे व्यापारियों को तरजीह मिली तो दूसरी ओर आदिवासी, दलित, पिछड़ी जातियों के मुद्दे भी सार्वजनिक रूप से दिखाई दिया। चुनाव ऐसा ही होना चाहिए जिसमें सभी जातियों और वर्गों के अलावे धर्मों से संबंधित समस्याओं पर विचार और विमर्श हों। राज्य के सत्ता पर जो दल आएं मगर उनको समाज के हकीकत का पता हों। चुनावी राजनीति में जितना ही मुकाबला कठिन होगा जनतंत्र उतना ही मजबूत होगा।


सौम्या तिवारी ने लिखा है - कहा जा रहा है कि गुजरात विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए एक आईपीएस अधिकारी ने इस्तीफा दे दिया है। इस्तीफा देने वाले अधिकारी का नाम पी सी बरांडा है। आईपीएस अधिकारी का कहना है कि बीजेपी ने उन्हें भिलोदा ( अनुसूचित जनजाति ) सीट से टिकट देने का वादा किया है। सूत्रों की मानें तो आईपीएस अधिकारी पी सी बरांडा अरावली जिले में भिलोदा से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार ने अधिकारी का इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया है। इस बात की पुष्टि खुद 50 वर्षीय आईपीएस अधिकारी ने की है कि राज्य सरकार ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है।[5] सौम्या के लेख को पढ़कर ऐसा लगा दलित मुद्दे के आदिवासी समाज को भी गुजरात के राजनीति में जगह मिल रही है।

राकेश मोहन चतुर्वेदी का मानना है - गुजरात चुनाव तेजी से जाति समीकरणों की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी जैसे सामुदायिक नेता पहले से इस दिशा में काम कर रहे हैं। पहले के घटनाक्रम से सबक लेते हुए कांग्रेस धार्मिक गोलबंदी से जुड़ी बहस में नहीं पड़ना चाह रही है। ऐसे में बीजेपी को इससे निपटने के लिए हिंदुत्व के बजाय इस स्ट्रैटिजी पर फोकस करने पर मजबूत होना पड़ा है।[6] मेरा भी मानना है हिन्दू समाज के भीतर पनपे असंतोष को अगर बी जे पी ने ठीक से नहीं समझा तो चुनावी समीकरण और बेहतर रणनीति के बाबजूद सफलता नहीं मिल पायेगी। शायद इसी दिशा में आईपीएस अधिकारी पी सी बरांडा जो आदिवासी समुदाय से हैं, उन्हें उतारा जा रहा है।


पिछले 70  सालों में गुजरात की आबादी वृद्धि हुयी है। सन 1 9 50 में में 16 लाख के मामूली आबादी से 2011 में  6.03 करोड़ तक पहुंच गयीं। गुजरात राज्य हड़प्पा काल से अभी तक व्यापार और वाणिज्य के लिए प्रसिद्ध रहा है। स्वतंत्रता के बाद भारत में हड़प्पा के युग के स्थानों की खोज सबसे अधिक गुजरात राज्य में हुईं। गुजरात में ही लोथल, सुरकोतदा, रंगपुर, रोजदी, मालवड, देसलपुर, धौलीवीराप्रभाषपाटन, भगतराव जैसे स्थलों मिले जो यह प्रमाणित भी करता है गुजरात में उद्योग ही नहीं उद्यम संस्कृति बहुत पहले से ही विद्यमान रही है।  धार्मिक रीति-रिवाज के मामले भी प्राचीन काल से ही रहा है। आधुनिक काल में गुजरात में गाँधी और पटेल ने भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को अलग दिशा दी। गांधीजी के पौत्र कानू गाँधी का मौत धन के अभाव में हुआ। लेकिन इस चुनाव में किसी ने भी चर्चा ही नहीं किया। कानू गाँधी नासा में वैज्ञानिक थे लेकिन कहानी ऐसी है जो हृदय विदारक भी है। ऊना कांड जो मानवीय अधिकारों के विरुद्ध भरतीय जनमानस पर कलंक है तो कानू गाँधी का मौत भी वृद्धों के अमानवीय स्वरूप का ही चेहरा है।
अहिंसा और सत्य के वाहक गाँधीजी के राज्य में हिंसा का दौर खत्म नहीं हो रहा है। अभी हाल में ही उत्तरी गुजरात के मेहसाना जिले में, पाटीदार युवा केतन पटेल को छह जून को जेल की मौत हो गयी। यह सभ्य समाज पर कलंक ही है। गुजरात अब जाति के जाल में जा चुकी है। जाल को कोई भी तोड़ें लेकिन जो भी तोड़ेगा वो केंद्र में अपनी जगह आसानी बना लेगा। गुजरात के जीत के कई मायने हैं। कोली जाति के संख्या को लगभग पच्चीस प्रतिशत बताया जा रहा है। पाटीदारों का प्रतिशत बीस प्रतिशत बताया जा रहा है। आकड़ों का ऐसा झूठा खेल पहली बार हो रहा है। ठाकोर को बीस प्रतिशत बताया जा रहा है। मुझे पता नहीं इस झूठे आकड़े को आकार देने से कोई लाभ भी है या नहीं। इतना तो पक्का है मुस्लिम समुदाय लगभग दस प्रतिशत और हिन्दू समुदाय नब्बे प्रतिशत है। लेकिन आंकड़ों के हकीकत पर अब विश्वास करना कठिन है।



पिछड़ी जातियों में लगभग 136 जातियों का सूची है। जो भी हों जी एस टी, धर्म, जाति और चुनाव सुधार के बीच गुजरात के जनमानस ही तय करेगें अपना राज्य और समाज का भविष्य, जनतंत्र में जनमत ही महत्वपूर्ण होता है। हमारे जनतंत्र के मजबूती का पहचान है की सैन्य शासन कभी भी भारत में नहीं लगेगा।


 

 




[1] http://bharatdiscovery.org
[2] http://hindi.webdunia.com
[3] https://khabar.ndtv.com/news/election/loksabha-among-26-elected-mps-from-gujarat-21-are-crorepatis-388751
[4] https://navbharattimes.indiatimes.com/state/gujarat/ahmedabad/why-gst-is-a-significant-poll-issue-in-gujarat/articleshow/61546661.cms
[5] http://www.hindi.indiasamvad.co.in/specialstories/gujarat-ips-officer-resigns-to-contest-elections-34033
[6] https://navbharattimes.indiatimes.com/india/gujarat-modis-team-forced-to-redraw-its-election-strategy-around-caste-equations/articleshow/61680211.cms

Comments

Popular posts from this blog

भारत की बहिर्विवाह संस्कृति: गोत्र और प्रवर

आपस्तम्ब धर्मसूत्र कहता है - ' संगौत्राय दुहितरेव प्रयच्छेत् ' ( समान गौत्र के पुरुष को कन्या नहीं देना चाहिए ) । असमान गौत्रीय के साथ विवाह न करने पर भूल पुरुष के ब्राह्मणत्व से च्युत हो जाने तथा चांडाल पुत्र - पुत्री के उत्पन्न होने की बात कही गई। अपर्राक कहता है कि जान - बूझकर संगौत्रीय कन्या से विवाह करने वाला जातिच्युत हो जाता है। [1]   ब्राह्मणों के विवाह के अलावे लगभग सभी जातियों में   गौत्र-प्रवर का बड़ा महत्व है। पुराणों व स्मृति आदि ग्रंथों में यह कहा   गया है कि यदि कोई कन्या सगोत्र से हों तो   सप्रवर न हो अर्थात   सप्रवर हों तो   सगोत्र   न हों,   तो ऐसी कन्या के विवाह को अनुमति नहीं दी जाना चाहिए। विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्ति की संतान 'गौत्र" कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भारद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। आगे चलकर गौत्र का संबंध धार्मिक परंपरा से जुड़ गया और विवाह करते ...

ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद

ब्राह्मण एक जाति है और ब्राह्मणवाद एक विचारधारा है। समय और परिस्थितियों के अनुसार प्रचलित मान्यताओं के विरुद्ध इसकी व्याख्या करने की आवश्यकता है। चूँकि ब्राह्मण समाज के शीर्ष पर रहा है इसी कारण तमाम बुराईयों को उसी में देखा जाता है। इतिहास को पुनः लिखने कि आवश्यकता है और तथ्यों को पुनः समझने कि भी आवश्यकता है। प्राचीन काल में महापद्मनंद , घनानंद , चन्द्रगुप्त मौर्य , अशोक जैसे महान शासक शूद्र जाति से संबंधित थे , तो इस पर तर्क और विवेक से सोचने पर ऐसा प्रतीत होता है प्रचलित मान्यताओं पर पुनः एक बार विचार किया जाएँ। वैदिक युग में सभा और समिति का उल्लेख मिलता है। इन प्रकार कि संस्थाओं को अगर अध्ययन किया जाएँ तो यह   जनतांत्रिक संस्थाएँ की ही प्रतिनिधि थी। इसका उल्लेख अथर्ववेद में भी मिलता है। इसी वेद में यह कहा गया है प्रजापति   की दो पुत्रियाँ हैं , जिसे ' सभा ' और ' समिति ' कहा जाता था। इसी विचार को सुभाष कश्यप ने अपनी पुस्...

गुजरात में जातीय समीकरण

गुजरात के चुनाव में अब गिनती के दिन रह गए हैं। चुनाव आयोग पर भी इस बार  तिथि नहीं घोषणा किये जाने के कारण आरोप - प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चूका था। लेकिन चुनाव आयोग ने बुधवार को गुजरात में विधानसभा की 182 सीटों पर चुनावों के लिए तारीखों की घोषणा कर दी। गुजरात विधानसभा चुनाव दो चरणों में कराए जाएंगे। पहले चरण का चुनाव 9 दिसंबर (89 विधानसभा सीटों के लिए ), जबकि दूसरे चरण का चुनाव 14 दिसंबर (93 विधानसभा सीटों के लिए ) को होगा। गुजरात और हिमाचल प्रदेश , दोनों जगह वोटों की गिनती 18 दिसंबर को होगी। गुजरात चुनावों में इस बार 50,128 पोलिंग बूथ बनाए गए हैं। गोवा के बाद हिमाचल और गुजरात ऐसे राज्य होंगे जहां चुनावों में शत प्रतिशत वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल किया जाएगा। [1] VVPAT मशीन  : विशेष जानकारी वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी (VVPAT) एक तरह की मशीन होती है , जिसे ईवीएम के साथ जोड़ा जाता है . इसका फायदा यह होता है कि जब कोई भी शख्स ईवीएम का इस्तेमाल कर...